Saturday, October 4, 2014

महंगी होती स्वास्थ्य सेवाएँ , आखिर क्यों?

महंगी होती स्वास्थ्य सेवाएँ , आखिर क्यों?

आधुनिकता के इस युग में जहाँ एक तरफ लोग स्वास्थ्य के प्रति अधिक सजग हो गये हैं वहीं दूसरी तरफ लोगों को रोज़ नयी बीमारियों का सामना करना पड रहा है.इसी जागरूकता के कारण लोग स्वास्थ्य सेवाओं पर बहुत अधिक ध्यान देने लगे हैं. इसी के चलते उस पर बहुत अधिक खर्चा भी होने लगा है. इस खर्च को बढाने में चिकित्सकों का भी योगदान कम नहीं हैं. इसी सजगता का गलत फायदा उठाकर बहुत से डॉक्टर अपनी जेबें भरने में लगे हुए हैं.


कम्पनियों और कुछ डॉक्टर्स का गठजोड़-


कुछ समय पहले The New York Times में एक चौकाने वाला तथ्य सामने आया था कि Harvard Medical School के ४७% से अधिक डॉक्टर दवा कंपनियों के नियमित payroll पर हैं. NYT के द्वारा ये पाया गया है कि दवा कंपनियों का सम्बन्ध शोधकर्ताओं को मात्र आर्थिक सहायता पहुंचाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके साथ ही उनके बीच बहुत सारे समझौते भी जुड़े हुए हैं. शोधकर्ता जिन कंपनियों की बनाई हुयी दवाओं की जांच करते हैं उन्हीं कंपनियों के लिए भी वे कन्सल्टेंट की तरह काम करते हैं. वे सलाहकार बोर्ड के मेम्बर बन जाते हैं, उन्हें पेटेन्ट व रोयल्टी के अधिकार मिल जाते हैं, कंपनियों द्वारा लिखित पत्रिकाओं में वे लेखकों की सूची में अपना नाम सूचीबद्ध करवाते हैं. कंपनियों द्वारा चलायी जा रही conferences में वे उनके उत्पादों का प्रचार करते हैं और इन सभी सेवाओं के बदले में उन्हें कीमती उपहार व अलग अलग जगहों पर जाने का मौक़ा मिलता है. बहुत सारे डॉक्टर कंपनियों के मुनाफे में बराबर के हिस्सेदार भी होते हैं. अगर कंपनी की दवाई ज़्यादा बिकती हैं तो उस मुनाफे में उन डॉक्टरों का भी हिस्सा होता है. चिकित्सा से जुड़े शिक्षण संस्थानों का झुकाव भी दवा कंपनियों की तरफ बढ़ता ही जा रहा है.Harvard पहले इस प्रथा से अछूता था लेकिन अब वह भी इसी धारा में बहता जा रहा है.

ऐसा लगने लगा है कि डॉक्टरों को जो ज्ञान पाठ्यपुस्तकों और अपने शिक्षकों से मिलता है वह ज्यादातर दवा और चिकित्सा उद्योगों के व्यापारियों द्वारा दिया गया भ्रामक 'ज्ञान' है! और तो और हार्वर्ड का रहस्योद्घाटन सिर्फ iceberg के टिप के बराबर ही है. हमारे भारत में भी ऐसा देखने में आ रहा है कि कई डॉक्टर दवा कंपनियों की कृपा के कारण बहुत विलासितापूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे हैं. चिकित्सा,शिक्षक और दवा कंपनियों के बीच रिश्ता दिन प्रतिदिन मज़बूत होता जा रहा है.


चिकित्सा शिक्षण व्यवस्था में कमी-

मेरा मानना है कि हमारी शिक्षण व्यवस्था में एक कमी और है; वो यह कि चिकित्सा विज्ञान के छात्रों को रिसर्च और statistics विषय undergraduate level पर पढने को नहीं मिलता. इसी कारण दवा कंपनियों द्वारा सामने रखे गए भ्रामक सांख्यिकी तथ्यों को चुपचाप मानने के लिए वे विवश भी होते रहते हैं. यदि यही statistics तथ्य उन्हें खुद समझ में आ जाएँ तो वे पहचान सकेंगे कि ये तथ्य कितने भ्रामक होते हैं.


दवा कम्पनियों द्वारा भ्रामक तथ्य देना-


उदाहरण के लिए High BP पर १७ Randomised Controlled Trial (RCT) किये जा चुके हैं जहां collective relative risk reduction (RRR) सिर्फ २०% था. इसी बात को पत्रिकाओं में व फार्मेसी कंपनियों के लेखों में जोर शोर से दिखाया गया.

यदि absolute risk reduction (ARR) पर नज़र डाली जाए तो यह केवल ०.८% है. यानि दवा लेने से survival benefit (SB) केवल ०.८% का है. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो-

“सामान्य से कुछ अधिक Blood Pressure वाला जो व्यक्ति ५ वर्ष तक लगातार दवा लेता है उसके जीवित रहने का प्रतिशत ९६.८% होता है.

दूसरी तरफ यदि कोई व्यक्ति ५ वर्ष तक दवा न लेकर केवल अपना खान पान व जीवन शैली सही कर देता है तो भी उसके जीवित रहने का प्रतिशत ९६% तक होता है !!!”

देखा आपने कि किस तरह सैकड़ों रूपए की उस दवा को पांच साल तक खाने के बाद भी सिर्फ ०.८% ही फायदा होता है. और यह बात दवा कंपनियों ने छुपा ली है.

इसी प्रकार के कुछ तथ्य कोलेस्ट्रोल कम करने वाली दवाओं के भी हैं. इन दवाओं को उपयोग करने और सलाह देने वाले डॉक्टर केवल वही figures देते हैं जो उन्हें दवा के प्रयोग करने के लिए बढ़ावा देती हैं.


चिकित्सा को व्यवसायिक दृष्टिकोण से देखने का प्रचलन-

ऐसा भी देखने में आ रहा है कि मेडिकल कालेजों में शिक्षक रॉयल्टी के बदले में products discovered लाइसेंस की अनुमति दे देते हैं.इस कार्य प्रणाली ने शिक्षाविदों, बिजनस और डॉक्टरों के बीच में एक गठजोड़ बना दिया है. जिसके कारण बहुत से डॉक्टर अब दवा कंपनियों के हाथों की कठपुतलियाँ बन गए हैं. कंपनियां डॉक्टरों से तब संपर्क करती हैं जब वे कम आयु के होते हैं; जैसे house officer आदि. कम उम्र वाले डॉक्टरों के पास अनुभव तो कम होता ही है साथ में उनका आगे का career भी लंबा होता है. ऐसे में अगर डॉक्टर का विश्वास जीत लिया जाये तो कंपनियों की दवाएं लम्बे समय तक बिकेंगी. ऐसी ही परिस्थिति मेडिकल कॉलेजों की भी है जहां के उच्च श्रेणी के छात्रों को कंपनियां कम उम्र में ही अपने रिसर्च संस्थानों से रिसर्च के नाम पर जोड़ लेती हैं.


रिसर्च के नाम पर नयी दवाओं का भारत में ट्रायल-

आप सभी ने देखा होगा कि भारत में CROs (clinical research organisations) की हाल में बाढ़ सी आई हुयी है. दरअसल पश्चिमी देशों की दवा कंपनियां हमारे जैसे देशों में अपनी नयी दवाओं का परीक्षण करने के लिए CROs चलाती हैं. कई पश्चिमी देशों में इस प्रकार की रिसर्चों को बैन कर दिया गया है; खासकर लंदन में हुयी Northwick Park Hospital tragedy के बाद; जिसमें एक दवा पर हो रही रिसर्च ने कई स्वयंसेवकों को मौत के कगार तक पहुंचा दिया था, और Hospital को कई मिलियन पौण्ड का नुकसान झेलना पडा था.


मेरा यह मानना है कि ये CRO हमारे देश के लिए मुसीबत बनते जा रहे हैं. किसी भी शोध कार्य को करने से पूर्व उसमें स्वेच्छा से भाग ले रहे लोगों की लिखित में अनुमति ली जाती है. हमारे देश में अभी भी अधिकाँश लोग अशिक्षित हैं जिन्हें न तो इन रिसर्चों का अर्थ समझ में आता है और न ही वे लिखित सहमति का मतलब ठीक से समझते हैं. ऐसे में की गयी रिसर्च को कहाँ तक सफल माना जा सकता है और इसमें कितनी नैतिकता है यह सोचने की बात है. लेकिन हमारे यहाँ कौन यह सब सोचता है ?

मरीजों की बीमारियों में कंपनियों द्वारा अपने आजीवन व्यवसाय को देखना-

इसके अलावा ऐसे कई रिसर्चर हमारे देश मैं हैं जिन्होंने अपने जीवन में शायद ही कोई एक भी मरीज़ देखा हो लेकिन वे सबके सामने बड़े बड़े रोगों की सफल चिकित्सा करने का दावा करते हैं. सत्यता यह है कि दवा कंपनियां ऐसे मरीजों पर अपना निशाना साधती हैं जिनसे आजीवन व्यवसाय चल सकता है जैसे- Diabetes, High BP, Arthritis,Coronary Artery Disease वाले मरीज़ आदि.

इलाज़ का अर्थ सिर्फ दवा खाना और महंगी जांच करवाने तक सीमित होना-

एक article में हाल ही में छपे हुए एक लेख में, British Medical Journal के भूतपूर्व एडिटर और Cases Journal in London के वर्तमान एडिटर Richard Smith ने बड़े ही साफ़ तरीके से ये बताया है कि किस प्रकार आज के डॉक्टर दवा कंपनियों के हाथ की कठपुतलियाँ बन गए हैं. जैसे जैसे कंपनियों और मेडिकल कॉलेजों की दूरी कम होती जा रही है वैसे ही चिकित्सा विज्ञान के छात्र दवाइयों और आधुनिक चिकित्सा के संसाधनों पर कुछ अधिक ही निर्भर होते जा रहे हैं. कंपनियों के लगातार बढ़ते दवाब से चिकित्सको ने ये सीख लिया ही की हर बीमारी के लिए सिर्फ दवा ही दी जाती है और अगर किसी के शरीर की रचना सामान्य से कुछ हटकर है तो उसके लिए शल्य क्रिया/ऑपरेशन करवाना ही एक मात्र रास्ता है. धीरे धीरे करके डॉक्टरों की भी MR से उपहार लेने की आदत पड़ जाती है. जो उन्हें अधिक और महंगा उपहार देता है वो डॉक्टर उनकी दवाएं ज्यादा मरीजों को लिखते हैं.

क्या किया जाना चाहिए-

हमें यह नहीं भूलना चाहिये की अभी भी विश्व की ८०% लोग आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से अनभिज्ञ हैं , अमेरिकी लोगों में से उच्च मध्यम वर्ग के ८०% लोग health insurance नहीं करा सकते क्योंकि उसका प्रीमियम बहुत अधिक है . ब्रिटिश लोगों में से ५७% लोग ऑल्टरनेटिव चिकित्सा पद्वति से इलाज नहीं कराना चाहते जबकि उनके देश में मुफ्त राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा है. अब समय आ गया है जब हमें इस रिवाज़ को बदलना होगा. डॉक्टरों को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके सम्मान के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. ऐसा न हो कि एक दिन हमारे मरीज़ यह कहने लगें कि आप लोग सिर्फ कुछ उपहारों के लिए हमें दवाएं लिखते हैं. चिकित्सा संस्थानों को छात्रों को यह बात बतानी चाहिए कि किस प्रकार MR लुभावने ऑफ़र देकर हमसे गलत काम करवाते हैं. मेरा मानना है कि छात्रों को वर्तमान में किताबी ज्ञान के अलावा फार्माको इकनॉमिक्स और चिकित्सा से जुडी व्यवसायिकता से अवगत कराना ज़रूरी है ताकि वे मेडिकल शिक्षा पूरी होने के बाद दवा उद्योग के व्यापारियों से भ्रमित न हों.

अब समय आ गया है की मेडिकल एथिक्स के प्रति मेडिकल छात्रों को पूरी जानकारी दी जाए जिससे उनके मन में चिकित्सा सेवा के लिए सम्मान की भावना उत्पन्न हो.

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि रोगी चिकित्सक के बिना जीवन यापन तो कर सकता है किन्तु चिकित्सक रोगी के बिना जीवन यापन नहीं कर सकता. इसलिए मेरा सभी चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े लोगों से आग्रह है चिकित्सा जैसे पवित्र कार्य को व्यवसायिकता और मुनाफे की नजर से न देखें और इसे कमाई की अंधी दौड़ से दूर रखें तथा चिकित्सा कार्य की गरिमा बनाए रखें जिससे आम जन का हम पर विश्वास बना रहे.

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सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ॥



धन्यवाद !!!!


आपका अपना,

डॉ.स्वास्तिक

चिकित्सा अधिकारी

(आयुष विभाग, उत्तराखंड शासन)

NOTE: ये सूचना सिर्फ आपके ज्ञान वर्धन हेतु है. किसी भी गम्भीर रोग से पीड़ित होने पर चिकित्सक के परामर्श के बाद अथवा लेखक के परामर्श के बाद ही कोई दवा लें. पब्लिक हेल्थ के अन्य मुद्दों तथा जनहित के लिए सुझावों के लिए लेखक से drswastikjain@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.





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