Monday, September 29, 2014

क्या उपचार के नाम पर अत्याचार उचित है?


क्या उपचार के नाम पर अत्याचार उचित है?




अपने परिवार और अपने जीवन से प्यार है तो समय निकालकर इस लेख को अवश्य पढ़ें !

आधुनिक चिकित्सा जगत की कार्यप्रणाली पर हँसा जाये , उन पर तरस खाया जाये या लोगो के ऊपर एक्सपेरिमेंट करने के कारण उन पर गुस्सा हुआ जाये !

हमारे पास विभिन्न रोगो से पीड़ित रोगी लगातार आते है जो AIIMS , Fortis और न जाने कितने बड़े-बड़े अस्पतालों से इलाज करवाते रहते है , लेकिन कई रोगों में बड़ी-बड़ी जांचो और वर्षों के उपचार के बाद भी आधुनिक चिकित्सा जगत रोगियों को उपचार में लाभ दिलाना तो दूर रोग का कारण ही नहीं समझ पाते !

वे इन्हें समझेंगे भी कैसे ! रोग का कारण होता कहीं और है और वो लोग ढूंढ़ते कहीं और है ! इसका छोटा सा उदहारण एक सामान्य से रोग के उपचार में उनके तरीके से देख लेते हैं -

रोगी कब्ज की समस्या से कई वर्षों से पीड़ित हैं , कभी - कभी सीने में जलन और खट्टी डकारें आती हैं और गैस पास न हो पाने के कारण पेट फूलता है , जिस कारण से भूख भी ठीक से नहीं लगती !

इस समस्या में आधुनिक चिकित्सा में क्या-क्या किया जाता है अब यह जानिए -

सबसे पहले Whole Body Examination की जाती है, सभी तरह के ब्लड टेस्ट कराये जाते है , Ultrasound किया जाता है, X -Ray किया जाता है जब इनसे कुछ पता नहीं चलता तब Endoscopy , Colonoscopy कराई जाती है । इतनी सारी जांचों के बाद कई बार रोगी जिस परेशानी के लिए आता है उसका तो कोई कारण पता नहीं चलता साथ में दो-चार नई बीमारिया और पता चल जाती हैं (सभी रोगियों में ऐसा नहीं होता कुछेक में ही ऐसा होता है ।)

इसके बाद शुरू होता है दवाओं का इलाज - कमाल तो ये होता है की कारण पता नहीं होता फिर भी इलाज होता है ।
रोगी को कब्ज के लिए luxative और गैस, एसिडिटी के लिए कुछ PPI दवाएं दे दी जाती हैं, कुछ Folic Acid की दवा दी जाती है ।

और ऐसी ही लक्षणों के आधार पर खूब अच्छी-अच्छी सुन्दर पैकिंग वाली दवाएं दे दी जाती है (दवाओं की सुन्दर-सुन्दर पैकिंग तो ऐसे की जाती है जैसे उनको खाया नहीं घर में सजाया जायेगा ! )

मरीज जब इतना सारा आडम्बर देखता है तो वह भी सोचता है की अब तो वह पूरा सही हो जायेगा ... और कमाल की बात तो ये देखिये इतने सारे आडम्बर के बाद वह यह पूछना भूल ही जाता है की उसका इलाज किस चीज का हो रहा है । और दवाओं का असर कैसे होगा !

अगर कोई पढ़ा-लिखा आदमी पूछ भी लेता है तो बता दिया जाता है जो दिक्कत है उसका इलाज शुरू कर रहे है , दिक्कत क्यों है ? कैसे है ? दवाएं खाने के बाद रोग पूरी तरह से ठीक होगा या नहीं ? इस तरह के प्रश्नो का जबाव होता है - देखते हैं दवा शुरू तो कीजिये !

बेचारा मरीज शुरू हो जाता हैं ...आधुनिक दवाओं को खाने की अनंत यात्रा की ओर ! इस दौरान बीच-बीच में बाबा जी का आसन भी कर लेता हैं लेकिन अंत में परिणाम क्या निकलता हैं ? या तो अस्पताल में भर्ती होकर और एक्सपेरिमेंट और जाँच ...अंत में ईश्वर की शरण में .....!!

या फिर कुछ एक खुशनसीब होते हैं जो आ जाते हैं आयुर्वेद की शरण में !

अब जानिए इन समस्याओं का आयुर्वेद में कैसे होता हैं उपचार -
कब्ज , गैस , एसिडिटी आदि की समस्याओं में आयुर्वेद में बहुत ही सामान्य चीज़ पर ध्यान दिया जाता हैं वह हैं वात और पित्त !

चौंकिये मत यह हमारे शरीर में ही रहते हैं ! और घबराइये भी नहीं यह वात और पित्त कोई भूत या जिन्न भी नहीं हैं जो शरीर पर सवार हो जाते हों ।

यह प्रकृति की ओर से हर मानव शरीर को दी गई एक अमूल्य धरोहर है ।

क्या है वात - पित्त -कफ़?
वात शरीर में प्राकृतिक रूप से मौजूद हवा की गति है (कुछ लोगों को हँसी आ रही होगी इसको पढ़कर ऐसे लोग कृपया पूरा पढ़ें )

ये प्राकृतिक रूप से मौजूद वायु शरीर की समस्त गतिविधियों का नियंत्रण करती है जैसे - शरीर में मौजूद खून अपने आप शरीर में नहीं घूमता यह शरीर में प्राकृतिक रूप से मौजूद वायु की गति के कारण पूरे शरीर में संचरण करता है , ठीक इसी तरह जब हम कोई खाना (आहार) खाते है तो वह अपने आप आगे बढ़ते हुए आंतों तक नहीं पहुँचता बल्कि इसी वायु/हवा के दवाव के कारण आगे बढ़ता है ।
शरीर के द्वारा साँस लेना और बाहर निकालना भी शरीर में प्राकृतिक रूप से मौजूद वात के कारण ही संभव होता है ।
ठीक इसी तरह से और भी कई प्रक्रियाएं इस वायु के द्वारा होती है ... वायु की इस गति को प्राकृतिक वात कहते है ।

इसी तरह से पित्त का काम शरीर में मौजूद गर्मी को बनाये रखना , शरीर के द्वारा अन्न के पाचन आदि कार्यों को करना है ।
जब हम कोई खाना (आहार ) खाते हैं तो यह अपने आप नहीं पचता / जलता . यह पाचन या आहार के जलने की क्रिया शरीर में प्राकृतिक रूप से मौजूद गर्मी Heat के कारण होता हैं आयुर्वेद की भाषा में इसे पित्त कहते है। आधुनिक भाषा में इनको Digestive Enzymes कहा जाता है।

ऐसे ही बहुत से कार्य शरीर में प्राकृतिक रूप से मौजूद यह वात और पित्त करते है ।
जब यह वात और पित्त बिगड़ जाते है या शरीर में अपनी प्राकृतिक अवस्था से कम या ज्यादा होते है तब वो रोग को बढ़ाते है । इनके कम या ज्यादा होने के मुख्य कारण हमारा खान - पान और अनियमित जीवन शैली तथा बहुत अधिक चिंता , शोक आदि होता है ।

जैसे की कब्ज में - वात जो की प्राकृतिक रूप से आंतों में मल को नीचे की ओर ले जाने का काम करती है वह गलत खान-पान आदि के कारण अपनी प्राकृतिक गति के विपरीत ऊपर की ओर हो जाती है जिससे मल नीचे की ओर नहीं जा पाता जिसे कब्ज कहा जाता है ।

ऐसे ही पित्त के बढ़ जाने पर शरीर में पाचन की प्रक्रिया बाधित होती है जिस कारण से शरीर में दूषित पदार्थ इक्कठे होने लगते है जो वायु की बिगड़ी गति के कारण ऊपर की ओर आते है जिसे अम्लपित्त या Acidity कहा जाता है ।

आयुर्वेद में रोगो का उपचार इसी तरह के शारीरिक और मानसिक कारणों को ध्यान में रखकर किया जाता है तथा रोग को उत्पन्न करने वाले आहार/ खान-पान को भी बंद कराया जाता है जिससे रोग जल्दी से और पूरी तरह से ठीक हो जाता है ।

(यहाँ पर उपरोक्त रोग का विवरण सिर्फ उदहारण के लिए दिया गया हैं ... ऐसे अनगिनत रोग हैं जिनका उपचार आयुर्वेद में संभव हैं ।)

इसलिए जागिये और समझिए की बड़े-बड़े अस्पतालों के चक्कर काट-काट कर इलाज करवाएंगे या प्रकृति के सिधान्तो पर आधारित जीवन के विज्ञान आयुर्वेद से स्वस्थ होंगे !

उपरोक्त तुलना आधुनिक चिकित्सको को नीचा दिखाने के लिए नहीं की गई है , निश्चित रूप से आधुनिक जगत में बड़ी-बड़ी रिसर्च हुई हैं , नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है लेकिन इतने अच्छे तरीके से रोगों की जाँच करने और बड़ी-बड़ी रिसर्चों के बाद भी सामान्य से रोगों में भी लोगों को लाभ नहीं मिल पाना यह दर्शाता है की कहीं न कहीं कमी है और वह है प्रकृति के सिंद्धातों की ओर ध्यान न देना । इस कमी को पूरा करता है आयुर्वेद इसलिए बेहतर और निरोगी जीवन के लिए आयुर्वेद को अपनाएं !

यहाँ पर दिए गए सभी विवरण हमारे मन की कल्पना नहीं है हम तथ्यों के आधार पर दुनिया के किसी भी मंच पर इनको प्रमाणित करने का सामर्थ्य रखते है। यदि किसी के मन में संदेह हो तो किसी भी जगह स्तरीय सम्भाषा में हमें बुला सकता है। हमारा यह घमंड अपने ज्ञान के कारण नहीं अपितु आयुर्वेद की शक्ति के कारण है। जय धन्वन्तरि ! जय आयुर्वेद ! -डॉ.अभिषेक गुप्ता

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